बमुश्किल फरिश्तों से मिलाता है ख़ुदा,

बमुश्किल फरिश्तों से मिलाता है ख़ुदा,
फिर क्यूँ ऐसी गलतियाँ कराता है ख़ुदा !
जो अनजाने में बड़ी भूल बन जाती हैं,
और हमे अपनों से कर देती हैं जुदा !!
धूप चाहे कितना खुद को पुचकार ले, चाँदनी नहीं बन सकती !
और रात चाहे कितना खुद को संवार ले, रोशनी नहीं बन सकती !!
तू उगते सूरज सा,मेरी दुनिया को रोशन कर दे,
मैं बिखरी रात सी,तेरे आगोश में सिमट जाऊं कहीं !
तू खिलते चाँद सा,मेरी चाहत का नूर बढ़ा दे,
मैं उलझी शाम सी,तेरी बाँहों में समां जाऊं कहीं !!

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