बंद कमरों के लिए ताज़ा हवा लिखते हैं हम

बंद कमरों के लिए ताज़ा हवा लिखते हैं हम खि़ड़कियाँ हों हर तरफ़ ऐसी दुआ लिखते हैं हम आदमी को आदमी से दूर जिसने कर दिया ऐसी साज़िश के लिये हर बद्दुआ लिखते हैं हम जो बिछाई जा रही हैं ज़िन्दगी की राह में उन सुरंगों से निकलता रास्ता लिखते हैं हम आपने बाँटे हैं जो भी रौशनी के नाम पर उन अँधेरों को कुचलता रास्ता लिखते हैं हम ला सके सब को बराबर मंज़िलों की राह पर हर क़दम पर एक ऐसा क़ाफ़िला लिखते हैं हम मंज़िलों के नाम पर है जिनको रहबर ने छला उनके हक़ में इक मुसल्सल फ़ल्सफ़ा लिखते हैं हम

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