कान्हा

कान्हा
साम दाम और दंड-भेद का केवल एक विधाता
कान्हा से कोई बड़ा हुआ ना कूटनीति का ज्ञाता
शत्रु जितने थे चुन-चुन कर सबको किया ठिकाने
राजनीति की चाल तुम्हारी कोई नही पहचाने
उठा के उंगली पर गोवर्धन अंहकार को तोडा
जिसे बनाया आपने अपना साथ ना उसका छोड़ा
चीर बढ़ाई लाज बचाई धन्य द्रोपदी माता
कान्हा से कोई बड़ा हुवा ना कूटनीति का ज्ञाता
गीता का उपदेश न देते तो अर्जुन क्या लड़ता
रन में देखे भाई – बंधु तो पाँव नहीं था बढ़ता
जब अर्जुन को युद्घभूमि में विराट रूप दिखलाया
बड़ा नही है धर्म से कोई तभी समझ में आया
वरना अपनों को अर्जुन क्या मौत की नींद सुलाता
कान्हा से कोई बड़ा हुआ ना कूटनीति का ज्ञाता
मामा कंस की सेना हो या फिर शकुनी का पासा
जो चाहा वो किया आपने देखें सभी तमाशा
गोप-गोपियों और राधा संग तुमने रास रचाए
और सुदर्शन चक्र तर्जनी पर धारण कर लाए
सिवा आपके कौन धर्म को धर्मयुद्ध जितवाता
कान्हा से कोई बड़ा हुआ न कूटनीति का ज्ञाता

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