मन का रवीश

रात भर नीँद टूटती रही मेरी

चादर समेटता रहा पैरोँ तले


सोच को लकवा सा मार गया


चाँद खिड़की से झाँकता गया


तारे टूटते गिरते आसमान से


जमीन खिसकती रही हाथोँ से


दिल खाली खाली सा हो गया

…………………………
आँखोँ मेँ इंतजार एक सुबह का


चाँद गायब सा होने था लगा


सूरज चढता आसमाँ मेँ देखा


किरणेँ छन गयी खिड़की से 


आलसी दिल को उर्जा दे गयी


हाथोँ मेँ आ गया चाय का कप


चाय की खूशबु साँसोँ मेँ घुली


रिश्ते तो तारोँ जैसे टूट गये


मन का रवीश जग गया

 

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