समर्पण…………

समर्पण…………

मिटटी का मानव,
संवेदना की पोटली,
कठोर पुरुषत्व,
क्रोध,प्रेम,हँसी-ठिठोली,

परत दर परत भंडारित अनुभव,
धन-धान्य,सम्मान,हर्ष और वैभव,

परिपूर्ण जीवन,
फिर भी खालिसपन,
न उम्मीद,
न सम्भव,
समय का पुनः चक्रण,
शेष जीवन,
प्रतीक्षित पुनर्जन्म,

मानव योनि में हो मेरा जन्म,
उसकी हो वही मुखाकृति वही चंचल मन,
कायर कहते लोग मुझे
और उसे बेवफ़ा सनम,

कठिन दोहे सा प्रेम मनुष्य का,
न छंद की समरसता,
न भावार्थ का सरलीकरण,
अतीत के रिश्ते,
समाज में पीसते,
करना पड़ता है समर्पण…………

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