दो पल का जीवन माँग रहे हैं…

वचन दिया था गीता में ‘मैं आऊंगा’, पर तू होता नहीं अवतीर्ण है
यहाँ आज जब मानवता के प्रासाद हो रहे जीर्ण शीर्ण हैं|
मनुष्य नहीं दिखते यहाँ ,यद्यपि नगर ये जनाकीर्ण हैं
होते मानव शेष यहाँ तो क्यों अस्त्रों शस्त्रों से, पृथ्वी का वक्ष होता विदीर्ण है|
हो गया है दैत्यों का राज्य फिर से ,हर जीव यहाँ भयभीत है
सूनी प्रकृति ,सूने जंगल , सब गाते मृत्यु के गीत हैं|
देखता नहीं तेरी धरती को , क्या हुआ तू अवचेत है
बांटकर तुझे लड़ते आपस में, कहा तूने था कि तू अद्वैत है|
निरपराधों पर आग बरसाते , कहतें है ईश्वर कि आज्ञा
अवचेत होकर दे भी हो तूने, तो क्या उनके पास नहीं है प्रज्ञा |
भूख प्यास से नन्हे जीवों का मुख , अब हो रहा है विवर्ण
विश्व के नक्कारों में दबती पुकारें उनकी ,क्या तेरे पास नहीं है कर्ण|
माना कि तुझे मानें न मानें , इसकी तुझे परवाह नहीं
पर क्या धरती की रक्षा की तुझे रही कोई चाह नहीं|
माना कि हम समझ न पाए तुझे कभी , तेरी नहीं कहीं भी थाह है
पर मदद कि गुहार लगायें कहाँ , तू ही सबका अल्लाह है|
धन ,धान्य, धर्मं, द्युति माँगना , मेरा नहीं स्वभाव है
कंचन की कामना करूँ कैसे फिर , यहाँ भोजन का अभाव है|
तेरी आवश्यकता आ पड़ी अब हमें , मानव स्वयं सहाय्य में नहीं समर्थ है
पर तू उदासीन बैठा है क्षीर मैं , इसका क्या ये अर्थ है|
निर्माण और पोषण करके विश्व का, अब यदि विनाश को प्रबुद्ध तू
स्वयं ही नष्ट कर मानव जाति को, धरती को कर दे शुद्ध तू|
पर वर्त्तमान विधि उचित नहीं, न होने दे आपस में युद्ध तू
कुचल दे धूमकेतु से हमें, यदि हमसे है क्रुद्ध तू|
पर इस अनल का कर दे शमन , तू कर दे पृथ्वी पुत्रों का उद्धार
मृत्यु से पहले थोड़ा जी लें हम, ये अस्वस्थ मृत्यु नहीं स्वीकार |
नाश से पहले फलना फूलना सीख लें, हम जीवन जीना भूल गए हैं
ये पल पल की मृत्यु बहुत हो चुकी , दो पल का जीवन मांग रहें हैं|

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