शान में तेरी अब मैं गीत नहीं गाता हूं

शान में तेरी अब मैं गीत नहीं गाता हूं अब तो जीवन में बस बुराई देख पाता हूं. कितने दीवानों ने थी जान लुटा दी तुम पर ना कभी याद में उनकी दिये जलाता हूं. जो मुझसे पहले थे, तुझको वो मां बुलाते थे अजीब बेटा हूं मैं दूर घर बसाता हूं. सरहदों पे जो ठिठुरते हैं जां लड़ाते हैं उनकी ख़ातिर ना एक शब्द गुनगुनाता हूं. शाम होते ही जाम हाथ में आ जाता है दोस्तों संग बैठ पीता और पिलाता हूं. ना ख़ून मांगूं और ना तुमको दूं मैं आज़ादी बसन्ती रंग से चोला नहीं सजाता हूं. तल्ख़ियों से भरी होती है शायरी मेरी ख़ुशी के नग़में नहीं आज मैं बनाता हूं वतन पे वीर हमेशा निसार होते हैं “चमन के फूल चमन की बहार होते हैं” कभी न मिलने पे होते थे बेक़रार बहुत अब उनसे मिल के भी हम बेक़रार होते हैं बनो तो मुफ़लिसो-नादार के बनो मेहमाँ वो मेहजबान बड़े ग़मगुसार होते हैं ये तेरी ज़ुल्फ़ बिखरती है जब तेरे रुख़ पर निसार होते हैं, मौसम निसार होते हैं जो बात आती है होटों पे हुस्न वालों के उस एक बात के मतलब हज़ार होते हैं तमाम रात वो तारे शुमार करता रहा भला किसी से ये तारे शुमार होते हैं ‘रक़ीब’ होते हैं वो लोग पैकरे-उल्फ़त के जिनके दामने-दिल तार-तार होते हैं

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