न जाने क्यों

बहती हवाओं में घुल सा रहा है मेरा मन
पेड़ों को हिलाती, सरसराती
ख़ुशी से भर देती हैं मन को ये हवाएं
फिर भी घुल रहा है मन
                       न जाने क्यों
ठंडी सांझ की निविड़ शान्ति में
फैली है शीतलता
फिर भी पिघल रहा है मन
                       न जाने क्यों
वर्षाजल के शीतल प्रवाह में
भीगे हैं सिर्फ पैर
फिर भी गल रहा है मन
                       न जाने क्यों
मैं हूँ स्वतन्त्र , राह स्वच्छ है और समक्ष है लक्ष्य
कोई नहीं रोकने वाला
फिर भी टहल रहा है मन
                       न जाने क्यों
चारों और हैं विश्वस्त लोग
निश्चिन्त है मष्तिष्क मेरा
फिर भी दहल रहा है मन
                       न जाने क्यों
समक्ष मेरे भीषण जल वर्षण
कुछ भी नहीं है शुष्क
फिर भी जल रहा है मन
                       न जाने क्यों
न जाने क्यों है मुझे महसूस होता
मन में कहीं कोई दरिया हिलोरें लेता
पर लौट जाता छूकर तटबंध
न होने देता अंतर्मन को मुखर , विचित्र है इसका द्वंद्व
एक सोता सा है अन्दर ख्यालों का
घुटता अन्धकार में
सिसकियाँ सुने देती हैं निविड़ निर्जन में भी
पर दिखाई नहीं देता कोई
                       न जाने क्यों

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