क्रोधित प्रकृति

किञ्चित् क्रुद्ध है प्रकृति
भिन्न हैं वर्षा कणिकाएं
इस बार
खिन्न है यथा मानव से
न तो बहार है
न ही रिमझिम
प्रकृति का प्रहार है
कठोर कंटीला
आक्रोश से लबरेज़
यथा तीक्ष्ण धार है
बाण की
इतना प्रताड़ित किया है
प्रकृति को हमने
कि अहिंसा का सन्देश
देने वाली वो
उतर आयी है
प्रतिहिंसा पर
पर न जाने किस रुआब में
खोये हैं हम
नासमझ से
जारी रखते हैं अपनी
अंधी दौड़ … मनमानी
पर हर दौड़ का अंत होता है
और विजेता होती है प्रकति
सदैव
मौज़ूद है सर्वत्र
विराट रूप में
क्या तुलना शूद्र मानव की
महासागर के समक्ष,
तर्जनी से किया गया गड्ढा
नगण्य है मानव
सम्भलना होगा हमें
शीघ्र ही
अन्यथा
प्रकृति प्रारम्भ करेगी
जनसंहार
क्रोध में भयावह है वो
व्याघ्र सी
याद रहे
सूर्य के आतप से बचाता बादल
बन सकता है चक्रवात भी

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