अक्सर डर जाता हूँ मै अपने ही साये से..

अक्सर डर जाता हूँ मै अपने ही साये से..

हम दोनों साथ साथ रहते हैं
एक अलग अलग फर्क के साथ
बताता रहता है अक्सर मुझे
मेरी ही बातें तर्क के साथ

अक्सर डर जाता हूँ मै अपने ही साये से..

जब प्यार प्रीत को कुचल कर
मैं शत्रुता के बीज रोपता हूँ
आगे बढ़ने के लिए जब जब
दोस्ती की पीठ में खंजर घोंपता हूँ

अक्सर डर जाता हूँ मै अपने ही साये से..

जब चेहरे पर राम के जैसा तेज़ लिए
आँख रावण की तरह चमक जाती है
लुप्त हो जाती है प्रेम की भावना कहीं,
और मन में वासना छलक जाती है

अक्सर डर जाता हूँ मै अपने ही साये से..

जब मेरी अक्ल. भद्दी शक्ल, पर हँसता हुआ
मेरा ही अक्स मेरी आत्मा को झंझोड़ देता है
मेरी सारी पूंजी, मेरा गुरुर, मेरा अभिमान
जब मेरा ही साया, सब कुछ पल में निचोड़ देता है

अक्सर डर जाता हूँ मै अपने ही साये से………….
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त्रुटि हेतु क्षमा प्रार्थी – गुरचरन मेहता

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