टूट कर मैं बिखरता नहीं

अंजाम की परवाह नहीं और आगाज़ से मैं डरता नहीं
इमानदारी के कुछ नज़दीक हूँ बेईमानी मैं करता नहीं

नश्तर सी चुभ जाती थी बात उनकी गहराई तक
नासूर ही रहने दिया कभी जख्म मैं भरता नहीं

दीवानों की दुनिया का हाल न पूछो क्या होता है
नशा प्यार का चढ़ जाए एक बार तो उतरता नहीं

अपने शौक पुरे कर लेता हूँ मैं कभी कभी खुद ही
किसी और कि दमड़ी से बन कर मैं संवरता नहीं

जिससे लिया जब लिया लौटाया सदा ही वक़्त पर
बोझ किसी कर्जे का अपने सर पर मैं धरता नहीं

इसे मैं न समझना यारों बस अपनों ही ने सिखाया
अब जमाने की ठोकरों से टूट कर मैं बिखरता नहीं II
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सर्वाधिकार सुरक्षित — त्रुटि क्षमा हेतु प्रार्थी — गुरचरन मेहता

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