आज तिरंगा करगिल घाटी में फिर से लहराया है

आज तिरंगा करगिल घाटी में फिर से लहराया है आज तिरंगा करगिल घाटी में फिर से लहराया है आज तिरंगा करगिल घाटी में फिर से लहराया है हिन्दु मुस्लिम सिख इसाई, सभी धर्म है यहां बसते, जो कि देश की खातिर जां भी, दे सकते हंसते हंसते, घर की बात को छोड़ो, चाहे जितना भी लड़ जाएंगे , आंच देश पर आएगी तो, मिलकर उसे बुझाएंगे, अपने कदमों पर दुश्मन का, शीश सदा झुअकवाया है, आज तिरंगा करगिल घाटी, में फिर से लहराया है ॥ हमने गोली कभी पीठ पर, मारी है ना खाई है, अपने अटल इरादों से, दुश्मन को धूल चटाई है, हम वो कायर नही, साथियों के शव को जो छोड़ चले, मतलब निकल गया है, तो फिर अपनो से मुख मोड़ चलें, किस किताब ने जाने तुमको, गंदा पाठ लिखाया है, आज तिरंगा करगिल घाटी, में फिर से लहराया है ॥ कुत्ते की जो पूंछ हो टेढी, सीधी कभी ना हो सकती, एक इंच भी भूमि अब तो, भारत मां ना खो सकती, वीर जवानों ने दुश्मन को, हटने पर मजबूर किया, वीर सपूतों ने घमण्ड, दुश्मन का चकनाचूर किया, हर जवान ने अपना लहू, पानी की तरह बहाया है, आज तिरंगा करगिल घाटी, में फिर से लहराया है ॥ चाहे लात लगें कितनी भी, सुधरे कभी शैतान नही, सामने आकर ले ले टक्कर, तुझमें इतनी जान नही, गैरा के कंधो पर जो, बंदूक धरे वो डरता है, गीदड़ की जब मौत आए, शहरों को दौड़ा करता है, वक्त पड़ें तो अंगारे, वरना ठंडी छाया है, आज तिरंगा करगिल घाटी, में फिर से लहराया है ॥ दोस्त समझकर स्वर्ण जयंती, वाली बस भिजवाई थी, पिछले युद्धों वाली बातें, हमसे सभी भुलाई थी, लेकिन गद्दारी करके क्यूं, छुरा पीठ में घोप दिया, करगिल में घुसपैठ कराके, युद्ध ये हम पर थोप दिया, दुश्मन उपर हम थे नीचे, फिर भी नाच नचाया है, आज तिरंगा करगिल घाटी, में फिर से लहराया है ॥ हम चाहते तो दो दिन में, नानी याद दिला देते , हम चाहते तो दो दिन मे, हार का घूंट पिलाअ देते, लेकिन वीर जवानों ने ना, मर्यादा को भंग किया, हमने अपनी सीमा में, रहकर दुश्मन से जंग किया, मार भगाया दुश्मन को, फिर विजय गीत ये गाया है, आज तिरंगा करगिल घाटी, में फिर से लहराया है ॥ साथ पड़ोसी कैसे रहते, ये भी तुझे तमीज नही, क्यूं तेरे इतिहास में बोलो, वफा नाम की चीज नही, कोई तुझको भाई समझे, तू ना इसके लायक है, आपस में लड़वाने वाला, तू असली खलनायक है, लाखों कुर्बानी दे कर के, मां का कर्ज चुकाया है, आज तिरंगा करगिल घाटी, में फिर से लहराया है ॥ पृथ्वीराज चौहान का, इतिहास नहीं दोहारएंगें, चार बार तो माफ किया है, और नही कर पाएंगे, सीमा पर जो आंख गड़ाई, क्च्चा ही खा जाएंगे, चांद सितारे तुझको प्यारे, वही तुझे पहुचाएंगे, हमने जहन्नुम का रास्ता, दुश्मन को सदा दिखया है, आज तिरंगा करगिल घाटी, में फिर से लहराया है ॥ बलिदान देश को देकर के, जो वीर स्वर्ग के द्वार गए, लेकिन हम समझौतों में, हर बार जीत के हार गए, किन्तु कोई भी समझौता तो, होगा अब मंजूर नही, सीमा ही जब मिट जाएगी, समझों दिन वो दूर नही, समझौतों के चक्कर में ही, हमने लाल गंवाया है, आज तिरंगा करगिल घाटी, में फिर से लहराया है ॥

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