बरसों पुराना एक ठूंट

बरसों पुराना एक ठूंट यों ही खड़ा हुआ था–

घर के आँगन में।

सुना है वह कभी हुआ करता था एक विशाल वट वृक्ष।

उसकी घनी छाँह में बड़े बड़े गुडगुडाते थे हुक्का,

बच्चे किया करते थे धमाचौकड़ी।

बड़े बूढों की अनुपस्थिति में–

गत यौवनायें, बुढीयायें बतियाती थी।

नव यौवनायें और छोटी छोटी बच्चियां खिलखिलाती थी-

और करतीं थी अठखेलियाँ।

कालान्तर में वह विशाल वट वृक्ष-

हो गया कालकवलित और खड़ा रह गया यह ठूंट।

एक दिन मैंने देखा उस ठूंट मै फूट रहीं थी-

हरी हरी कोपलें।

वह ठूंट होना चाहता था पल्लवित।

मै प्रकृति की इस लीला को देखता ही रह गया।

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