रिस्तो की गहराई

मुझे न समझाओ रिस्तो की गहराई
देखा है मैंने अपनों को अक्सर
राहों से मुड़ते हुए

कभी कोई हम रही हुआ
बही किसी ने अपने को दोस्त कहा
मंजिल तक जाते-जाते
मंजिल सब की जुड़ा हुयी

सपनो को भी समझाओ न मुझे
खुली आँखों से धोखा देखा मैंने
कसमो की बात ही अलग थी
तोड़ी किसी ने बिखरे हम

मुझे न समझाओ रिस्तो की गहराई
नापने निकले तो सिर्फ खाक हाथ में आई
नकाब हटा चेहरों से
हर छुपे हुए चेहरे की सूरत नज़र आई

2 Comments

  1. mahendra gupta 05/12/2013
    • Rinki Raut Rinki Raut 06/12/2013

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