गज़ल -उर उद्वेलन में

उर उद्वेलन में
पलकों से झरे
हया लफ़्ज़
जो
जा अटके थे
ओष्ठ-प्रकोष्ठ
संवेदी हूक संग
आहिस्ता-आहिस्ता
मेरे दिल में उतरे
बांछें खिलीं
और
काफ़िए बन गए
जो
गुनगुनाए मुहब्बत ने
तो
गज़ल बन गई ।

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