बूंद बूंद की चाह,

लाल भभूका सूरज लगता,

झुलस रहे धरती के प्राण,
गर्मी की बेरहम दुपहरी,
मांग रही है त्राण
बादल को तरसे हैं नैना,
बूंद बूंद की चाह,
पीपल की छाया भी सिमटी,
ढूंढ़ रही है छाँह.
ज्वाला ही ज्वाला है तन में,
हों कैसे शीतल गात?
गर्म भट्ठियों सी तपती लू,
ग्रीषम के उत्पात .
गर्म स्वेद से क्या बुझ पाए,
मन की शाश्वत प्यास.
उस पावस की बाट जोहते,
पावक बन गए लोग,
जल ही जीवन रटते रटते
टूट रही है आस..
नदिया सुख़ गई जल भीनी,
उथली हो गई थाह,
रेतीले तट सा जीवनहै,
विकल हो गई आह.
ओ मतवारे, कजरारे घन,
प्यास बुझा हर मन की,
अब तो आओ मन के नभ पर ,
तुझे कसम अंसुवन की

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