पिता – के नाम एक कविता

यह तुम्हारा स्नेह ही तो था,
जो संघर्षों के जंगल में,
किसी बासंती बयार की तरह,
सहलाता रहा मेरे शूल चुभे पांवों को.
फूलों की सेज न सही,
हरियाली तो थी मेरे सामने ..
खुले आकाश की तरह.
कुछ सपने थे इन्द्रधनुषी, ..
कल्पना के पंखों पर तैरते हुए..
किसी अज्ञात मंजिल की तलाश में-
यह तुम्हारा स्नेह ही तो था-
जिसने मेरे थके पांवों को एक दिशा दी,
भटके हुए रेगिस्तान में -पानी की एक बूंद की तरह..
चातक सा मन भटकता रहा,
किसी स्वाति बूंद की तलाश में-
पलकों पर छाये बादल घने होते गए,
अँधियारा घिरने लगा-
यह तुम्हारा स्नेह ही तो था,
जिसने प्यासे होठों को ,
अंतर के आन्सुवों से सींचा था.
ओ पिता!,..माँ, तुम हो तो मैं हूँ,
मेरे सपने हैं..मेरे गीत भी,
मैंने पार किये खाई, जंगल ,पहाड़,
संवारा अपने सुरभित आकाश को,
यह तुम्हारा स्नेह ही तो था, –
जो चलता रहा, प्रति पल, प्रति क्षण, –

मेरी साँसों के साथ साथ …-''

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