लॊ दिए की

सहज सार्थकता लिए अभिव्यक्ति मेरी ,
जल रही हूँ जैसे जलती लॊ दिए की .
भावनामय शलभ का सर्वस्व खोना ,
और निशि दिन वर्तिका का मृदु समर्पण,
प्रीति की वह डोर पावन वंदना सी,
तप रही हूँ जैसे तपती लॊ दिए की ,
रौशनी की धार बनती दीपमाला ,
एक नया संसार बुनती किरण बाला ,
जगमगाती आरती में, देवता के अर्चना सी,
पूजिता मै -जैसे पूजित लॊ दिए की।,
मै तुम्हारा ही तो हूँ प्रतिबिम्ब पावन,
कह उठा नभ सिक्त नयनों से,नदीकी
दीपकों की पांत जलती ज्यों पुलिन पर,
है सुशोभित तारकों की पांत मेरी'
मै  नदी हूँ,तरलता अवलंब मेरा,
बह रही हूँ,जैसे बहती लॊ दिए की,–>

Leave a Reply