वाणी -वन्दना

मातु विनत  वंदना हमारी
तुम्हे समर्पित ह्रुदयांतर से ,मातु विनत  वंदना हमारी,
अक्षर अक्षर बांध लिया है ,भाव- सुमन मुक्ताहारों से,
स्वर वैभव के गीत रचाकर ,सरगम के स्नेहिल तारों से
विश्वासों  का दीप जलाये ,मातु सहज प्रार्थना हमारी .
मातु विनत  वंदना हमारी
पाँव भटकतेजग-अरण्य में,मन बोझिल और पथ दुर्गम है,
लक्ष्य शिखर को छू पाना भी,शूल वेदना सा निर्मम है,
एक आशा अभिलाष जगाये ,मातु सरल कल्पना हमारी,
मातु विनत  वंदना हमारी-
जीवन के अंधियारे तम में ,पथ मेरा आलोकित कर दो,
आज लेखनी के शब्दों में ,नवल चेतना ,ज्योति-प्रखर दो,
आंसू से भीगे गीतों में ,भाव करुण दो,नूतन-स्वर दो,
अनुरागी मन की कविता में मातु मुखर कामना हमारी
मातु विनत  वंदना हमारी।
कोटि कोटि कंठों से मुखरित
मातु तुम्हारी चरण वन्दना
राष्ट्रगान बन गुंजित नभ-तल ,
देश प्रेम की मधुर भावना.
बनूँ जागरण-गीत ,मातु ऐसा वर देना.
भूख,गरीबी,संघर्षों केविकट निशाचर,
घूम रहे चहुँ ओर,शश्यश्यामला धरा पर
अपने हाथों में कलम थाम,अक्षर-योद्धा,
जब लिख देंगे श्रम गान ,अभावों के पट पर,
मै सृजन सूर्य बन जागूं ,मातु इतना वर देना.
शब्द शब्द बन ज्योति प्रखर,
जागे शिखरों पर,
शत शत दीप जले, भारत माँ के चरणों पर,
मै विरल दीपबन जलूं ,मातु इतना कर देना.
गीत हूँ मै
गीत हूँ मै
अक्षरों की शुभ रंगोली
प्रार्थना की पंक्ति में इसकोसजाना ,
प्रीत हूँ मै ,
भावना केतार पर पुष्पित तरंगित ,
तुम ह्रदय के साज पर इसको सजाना
जीत हूँ मै ,
कर्म के शत शत शेरोन से ,
हर अनय को ध्वंश करती ,
तुम नये विश्वास का श्रृंगार करना,
… शक्ति हूँ मै ,
विजय के रथ पर पली हूँ,
हर समर में विजयिनी सी ,
तुम धरा की सर्जना को मान देना ,
ज्योति हूँ मै ,
चिर असीमित अरुणिमा सी ,
सृजन के श्रृंगार में आलोकभरती ,
तुम गगन के भाल पर यों जगमगाना
भक्ति हूँ मै ,
पुष्प कोमल गंध चन्दन ,
आरती की भाव भीनी वर्तिका सी
देव केनिर्माल्य में मुझको पिरोना

One Response

  1. saurabh shukla 03/12/2013

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