बजूका

मेरी हालत है एक बजूके जैसी।
इसे अपने हाथ पैर चलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
परिन्दे व जानवर वहाँ किसी के होने के अहसास के चलते-
स्वयं ही भाग जाते हैं।
कुछ दुष्ट उसके सिर पर बैठ कर बीट भी कर देते हैं।
यहाँ कुछ लोग मेरा होना महसूस कर-
स्वयं ही मर्यादित हो जाते हैं।
कुछ दुष्ट बुद्दि नकारते हुये मेरा अस्तित्व-
करते हैं मनमाना व्यवहार।
और मुस्कराकर वक्र दृष्टी से देखते हुये
मुझे मेरे बजूके होने का अहसास करा जाते हैं।

2 Comments

  1. mahendra gupta 02/12/2013
    • Jayanti Prasad Sharma Jayanti Prasad Sharma 04/12/2013

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