अपनी आग से जला हूँ मैं

अपनी आग से जला हूँ मैं
फिर से राख बने के गिरा हूँ.
पर राख राख नहीं रहती ना,
फिर से उठा हूँ मैं
किसी फीनिक्स के मानिंद-
हवा में,
ऊँचा,
और ऊँचा
उठता हूँ.
अपनी ही आज़ादी से बना हूँ मैं,
आज़ादी जिससे हूँ मैं पूरा –
अपने पोरों में,
अपने पँखों में,
अपनी आँखों में,
अपनी साँसों में.
हाँ, अपनी ही आग से जला हूँ मैं,
पर राख से उठा हूँ.

तेरी आँखों की चमक,
उनकी आँखों के आँसू.
उनकी ताली की चटचट,
ढूँढती है मुझे, मैं जानता हूँ.

पर, आसमान के पार,
अभी और उड़ना है मुझे,
उठना है मुझे.

अपनी ही आग, और सपने के साथ,
फिर राख से उठना है मुझे.

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