मर्द एक नादान जात

मर्द एक नादान जात

मर्द तू एक नादान जात है,

औरत नचाती है, तुझे उंगलियों पर, और, तू आत्मसात् है।

नशे का मूलस्रोत है वह, नशा ही औरत का दूजा नाम है,

इसीलिये शराब और शबाब का, चोली दामन का साथ है।

औरत तो एक कामाग्नि है, मर्द एक भस्म सारांश है।

मत भूल, भस्मित करती है तुझे, अपने कमलनयन कामाक्षि बाण से,

उसकी कामुक कजरारी आंखों में ही, छिपा, वशीकरण का जाल है !

तेरे ही भस्म का टीका, उसके माथे पर होता शोभायमान है,

जिस पर उसे है अभिमान, इसीलिये कहलाती,  देवी  महान है।

क्यों बनता है नादान, औरत जात, तुझी से रखती अपनी पहचान है,

तू ही तो उसका निगहबान है।

भूल जा पहले की नारी, जिसकी छवि में, सावित्री, सीता, राधा थी,

आज की नारी,पहले की, मेनका, रम्भा, पर भी भारी है।

नये ज़माने की तेज आग है, अपने आपमें वह नूरे-आफ़ताब है।

हाथ-कंगन को आरसी क्या,

पहले वह एक ही आवाज में हाजिर होती थी,

आज वह, हाजिर जवाब है।

मर्द आज भी तू नादान बड़ा है,

तू आज अपनी बीवी से भी हो चुका है बेगाना,

सिर्फ तेरे पास है, पैमाना और मयखाना।

बीवी तेरी को भी, आज तुझसे कुछ नहीं चाहीये,

बच्चों का तो तूने, दे ही दिया उसे नज़राना,

बस, उसे अब क्या चाहीये,

तेरा नाम, तेरी दौलत, और तेरा दौलतखाना।

नये जमाने की पुतली है, तू तो उसकी कठपुतली है।

खुद पहले नशा करायेगी, फिर शोर मचायेगी,

मेरा मियाँ नशेबाज है, देखो पीकर धुत्त पड़ा है।

तू तो अब बूढ़ा हो रहा है, ऊपर से नशे ने तुझको तोड़ दिया है,

पचपन का है, पचहत्तर का दिख रहा है।

नशे ने तुझे खोखला कर दिया है,

अलमारी तो है, पर, सामान से खाली है।

ऐसे तो बन गई है आज, मियाँ-बीवी की जोड़ी,

मियाँ पिसता रहे, बीवी बनी हथौड़ी।

दो पाटन के बीच में साबित रहा न कोय,

शराब और शबाब के बीच में, मर्दों की ऐसी ही गति होय।

उद्धृत:  लेखक की पुस्तक ’ मधु बावरे ’ से।  

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