सागर मंथन

भाव मन में
डोल रहे
सागर में उठते
चक्रवात से
लहरों की
हिंडोल से |
कर देते
सागर मंथन
निकलते-
ऐश्वर्य भी,
अभिशाप भी |
पृथ्वी फिर
नहीं रहती
वैसी की
वैसी ही
जैसी थी
सागर मंथन के पहले |

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