सच कड़वा

अखबार की कतरनों को
लोग कूड़ेदान में डाल देते हैं
जबकि काल्पनिकता की पुट लिए
कविता और कहानी को
लोग गले लगाते हैं
और
अमर साहित्य की श्रेणी में बैठाकर
पुरस्कारों और पदकों की
माला पहनाते हैं
और उन्हें
अपने-अपने पुस्तकालय में रखकर
घर और उसके बैठकखाने की शान बढ़ाते हैं |

यही कारण है कि आज
अखबार और समाचार भी
समाचार कम और गल्प ज्यादा हो गए हैं
और कालजयी रचनाओं के समकक्ष आ गए हैं|
और हर घटना की खबर
अखबारों की नीति के अनुसार
एक अलग स्वतंत्र गल्प होती है
जिसका हर कोई अपने-अपने अनुसार
अर्थ निकालता है,
व्याख्या निकालता है
और पल्लवन करता है |
एक ही सच के कई वर्त्तन हो जाते हैं
और पढने वाला जैसे
चंद्रकांता संतति की रहस्यमय
तिलिस्म में फँस जाता है
और सत्य को जानने के लिए और ज्यादा
और और ज्यादा पढ़ता जाता है
जबतक कि स्वयं पत्र ही
उस संतति को बंद नहीं कर देते
और किसी और गल्प की शृष्टि
कर नहीं लेते |

समाचार प्रेषक लेखक और कवि बन गए हैं
और शोहरत और कामयाबी की
मिशाल बन गए हैं|

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