समझ बैठे

हमने तो मांगी थी सलाह तुमसे और तुम सवाल समझ बैठे I
चाहा था महफ़िल में रंग ज़माना और तुम बवाल समझ बैठे II

अंधेरों को उजालों में बदल दिया था जरा सी रौशनी ने,
वे तो बस दीया और बांती थे और तुम मशाल समझ बैठे I

कहा था न उसकी गुस्ताखियों को नज़र अंदाज न करना,
वह कातिल था और तुम उसे ही अपनी ढाल समझ बैठे I

झूठ को सच की तरह बयां करना बखूबी जानता है वो,
सर से पाँव तक झूठा है और तुम बेमिसाल समझ बैठे I

दिल की गहराईयों से चाहा था कभी हमने तुम्हे सनम,
मोहब्बत थी सच्ची और तुम जी का जंजाल समझ बैठे I

होली पर लाल-नीले हर रंग से रंग दिया था हमने तुम्हे,
वो रंग प्यार का था जानेजां और तुम गुलाल समझ बैठे II
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त्रुटि क्षमा हेतु प्रार्थी — गुरचरन मेहता

2 Comments

  1. nitesh banafer nitesh singh 24/11/2013
  2. Muskaan 11/12/2013

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