कुछ मुक्तक (IV)***

दिल-विल,प्यार-व्यार, बातें सुन सभी मुस्काने लगे हैं I
लोग हीर को हीर नहीं, रांझे के नाम से बुलाने लगे हैं I
यकीं नहीं था जिन्हे दिलवालों की झूठी सच्ची बातों पे,
वादा निभाने के लिए इन दोनों की कसमें खाने लगे हैं II (१)..

दिल ने दिल से इशारा लेकर मोहब्बत निखार ली I
फूल ने भी खार से सहारा लेकर बगिया संवार ली I
हमें भी बंधी है कुछ ऐसी ही उम्मीद तुमसे सजन,
नदी ने जमीं से किनारा लेकर ज़िंदगी गुज़ार ली II (२)..

खुदा ने हुस्न-इश्क़ के दरबार में पैगाम भेजा है I
सितारों ने आसमान से ज़मीं पर सलाम भेजा है I
दिल का आईना भी दिखा देंगे किसी दिन सनम,
मेरे हाथों की लकीरों में बस तेरा ही नाम भेजा है II (३)..
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त्रुटि हेतु क्षमा हेतु प्रार्थी — गुरचरन मेहता

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