हुँकार भरो हिंदी ?

हिन्दी तुमको तरस ना हो जी कागज में तू ही रहती हो।
श्रद्धा सहित नम्र वाणी बन साधुसन्त मन हरती रहती हो।।
राजाओं के घर की शोभा, मधुर गीत से रंग भरती हो।
सूर श्याम बन सावन भादों, मथुरा में जा रमती रहती हो।।
ग्वाल-मंडली मध्य विराजत, किलकारी भरती कहती हो।
भरि-भरि उदर विषयदु:ख खचियन हिन्दी छत्रिय सी सहती हो॥
धन्य सपूत अवनी तल हिन्दी लाछाए आद्य शंकराचार्य।
आठ वर्ष में वेद उचारे बारह छ: शास्त्र,धन्य हिन्दी आर्य॥
सूर चन्द्रमा चेहरे चमके विंदी गंगा मां सी बहती।
साये में साहित्य है अनगिन भाषा हिन्दी तुलसी बहति॥
रति विहार तू-प्रेम राग हो कुमुद कली रजनी गंधा हो ।
विकल विमल निर्मल रस-रंग-गंध में हिन्दी तू गंगा हो॥
लहर तुम्हीं हो कहर तुम्हीं हो करुणा भरी भावना हो ।
गंगा सरजू सरस्वती बहना, फाग भरी साधना हो ।।
अम्बर हिन्दी तम् हिन्दी जन-मन हिन्दी ही आराधना हो ।
सूर कबीर शारदा तुमसे तुलसी की साधना हो ।।
ॐ नाम प्रतिबंध लगा जब भारत मेंथा अंधेरा हिन्दी।
चिंतित रहते भाई बहना, राखी कर बँधवाने बिंदी।।
हिन्दी हिन्दू बौध्य जैन औ मौलवी करने को उपकार ।
परमारथ उद्धारक हिन्दी करते थे राम शिव भी प्यार।।
हिन्दी मंत्रों में मूल मंत्र हो मानो काशी मथुरा राग ।
हिन्दी शिव सिद्ध साधू सम मानव हो मानव घनश्याम।।

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