मुक्तक

ध्यान में वो गान में वो प्रान में वो बसे जैसे |
आन में वो शान में वो ज्ञान में वो कसे जैसे ||
कान में कह गया जैसे संदेसा अश्रु कोई है ?
मान में वो घ्रान में वो दान में वो फंसें जैसे ||

जिस्म में जान बाँकी है इश्क अरमान बाँकी है |
मोहब्बत शान बाँकी है कहर फरमान बाँकी है ||
बाँकी तो बहुत कुछ है बाँकी सब वसूलेंगे |
वो साँकी हैं मेरे दिल के सूरा सुर तान बाँकी हैं ||

जाने कब कहाँ किस मोड़ पर कोइ अलबिदा कह दे ?
जिंदगी का भरोसा क्या ये जाने कब बिदा कह दे ?
मौत को चूम लेंगें हम मगर फ़रियाद हैं मेरी |
इश्क के जोश में आकर तू हम पर हैं फ़िदा कह दे ||

बहुत से लोग कहते हैं कि अब हम भी दिवाने हैं |
हमारे गीत जैसे बन चुके पागल तराने हैं ||
पागल हम हुए हैं जो तो वो क्या हैं परमज्ञानी ?
जो पागलपन बांटते हैं वो तो पागल खजानें हैं ?

दिन वो कौन सा होगा जब उनको भूल जायेंगे |
रात को नींद हम लेंगें दिन को मुस्कुराएंगे ||
अटल सिद्धांत ईश्वर का न्याय सबको हि मिलता हैं |
हम मरके भी अमर होंगें वो खुलकर रो न पांयेंगें ||

समय का हैं कहर ऐसा जो सबपर हि गरजता हैं |
समाकर आँख में जैसे बादल बन बरसता हैं ||
समय को दोष कैसे दें समय सम भावकारी हैं |
समय तो राम रावण कंस कृष्णा पर गुजरता हैं ||

आचार्य शिवप्रकाश अवस्थी
9582510029

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