अनंत की उड़ान

नीले आकाश में पंक्तिबद्ध
धवल पक्छी
उड़ रहे थे
और मैं टकटकी लगाए
लगातार देख रहा था|

नैसर्गिक दृश्य !

पंक्तियों को तोड़कर
अपने संगियों को छोड़कर
एक पक्छी निकल पड़ा
और ऊंचाई को मापने |
और देखते ही देखते
आँखों से ओझल हो गया|

रंग में भंग!

आज तक मैं उस पक्छी
की राह तक रहा हूँ
और इसी उम्मीद में
जी रहा हूँ कि
वह फिर लौटेगा
और आकाश में
फिर से दिखेगा
उस दिन सा ही
नैसर्गिक दृश्य !

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