विष और अमृत

विष और अमृत

जल में मिलकर
प्रिय पेय बनकर
गले से उतरकर
अंतड़ियों को गलाकर
जिसने ले ली जान
उस विष को हमने
अपने अंतिम समय तक
अपना प्रिय ही तो माना|

विष और जान !
विष और अमृत !
अमृत और जान !
विष, अमृत, जान !
पिंजरे में प्राण
विष ने किये मुक्त
अमृत ने कैद|

मोक्ष क्या विष से?
या अमृत से ?
विष प्रिय, अमृत प्रिय
पर मुझे अपनी
सादी रोटी से ही
जी लेने दो
और पा लेने दो मुक्ति!

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