जिंदगी और मौत सहेलियाँ

जिंदगी और मौत सहेलियाँ

 

किसने कहा, जिंदगी और मौत में दुश्मनी होती है,

नहीं, वह तो आपस में अच्छी सच्ची सहेलियाँ होती हैं।

दोनों में अक्सर होड़ लगी रहती है,

कौन आगे और कौन पीछे रहता है, कौन जीतता और कौन हारता है।

देखो ! अब भी मौत जिंदगी के शानों पर हंसी ठिठोली कर रही है।

मौत कहती है, अब यह थक चुका है, इसे अब ले जाने दे,

जिंदगी की वकालत है कि,

अभी यह नौजवान है, दुनिया अभी देखी नहीं,

ठोड़ा सबर कर, फिर ले जाना, इसे होश तो आने दे।

मौत का दावा है कि,

अब इसे होश नहीं आयेगा,

इसने नशे की लत्त से गहरी दोस्ती कर ली है।

ये तो मुझे भी आंखें दिखाने लगा है, और भी चिढ़ाने लगा है।

बीवी की भी दुआयें, इसके नाम की नहीं है,

इसकी सलामती से, उसका भी जी घबराने लगा है।

जिंदगी तू क्यों फिक्र करती है,

यह तो तेरे नाम से भी, अब कतराने लगा है।

इसके अंदर अब कुछ नहीं रहा है,

बस अलमारी ही अलमारी है, अंदर सामान नहीं रहा है।

तुझे क्या बताऊं बहना, इसकी तो कसम हैं,

सदा नशे में ही रहना,

चाहे बिक जाये खुद इसकी बीवी, चाहे उसका गहना।

कब बीता बचपन, कब लड़कपन, कब आई जवानी,

इन सब की कहानी होती भी अजीब है,

माचिस की तीली पर लगा मसा,

जलता इक बार ही है, फिर, रह जाती है लकड़ी,

ऐसा ही इसका नसीब है।

अब इसका कुछ और नही है चारा,

ये हर तरफ बीमारियों से है मारा।

बस बहना,अब और कुछ नहीं है कहना,

अब लगा ले मुझको गले,  इसको लिये सफर है करना।

जिंदगी ने भी गहरी साँस ली,

थक चुकी थी, निराश हो चुकी थी,

जिंदगी को चैनो-करार आया,

उद्धृत: लेखक की पुस्तक ’ मधु बावरे’ से।  

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