पतझड़ सा सारांश

पतझड़ सा सारांश

 

पतझड़ के सूखे पत्ते जैसा सूखता जाता है,

अब तो जान गया है तू नशे से तेरा कैसा नाता है।

यह मौसम की हेरा फेरी, तेरे चंचल मन ने जाना है,

आना था बसंत तुझपे, पहन लिया, पतझड़ का जामा है।

नशे ने कर लिया तुझ पर ऐसा काबू,

जवानी फूटी भी न थी कि,

बुढ़ापे के निशान पर तेरा फसाना है।

उम्र हुई पचपन की सिर्फ, लगता है जैसे कोई,

पचहत्तर का दीवाना है।

यह उखड़ी उखड़ी दाढ़ी, यह उजड़े उजडे़ बाल,

हाथों, टागों में नही ताकत, दांतों ने दिया जवाब।

क्या हो गया है तेरा अब हाल,

अब तो तेरे हर अंग ने करना शुरू किया,

अपना अपना हिसाब।

धन-दौलत अब किस काम के तेरे,

अब तो रिश्तेदारों ने भी, दिया जवाब।

सांसें बंद हो रही हैं तेरी,

जिंदगी ने कर लिया हिसाब।

पतझड़ के पत्ते सा जो ठहरा,

मौत की आंधी ने अब,

ख़त्म कर दिया, तेरे जीवन का सारांश।

 उद्धृत:  लेखक की पुस्तक ’ मधु बावरे’ से।

Leave a Reply