बचपन नशे का

बचपन नशे का

 

बचपन की मौज मस्ती का, रह गया बस इतना ही फ़साना है,

दूर हुई पुस्तक किताबें, अब तो नशे का ही ज़माना है।

पढ़के किताबों की हस्ती को, अब किसने जाना है,

मदरसे और कॅालेज तो सिर्फ अब,

इक डिग्रीयों की टकसाल, इक छापाखाना है।

बचपन ने जब से होश संभाला है,

अपने बाप को नशे में ही पाया है,

मां पर भी पड़ा उसी का साया है।

दोनो ही है नौकरी पेशा, घर की लगाम उनके बस में नहीं,

किस हाल में है बचपन घर में, इसकी खबर कुछ भी नहीं।

नौकरी के चक्कर में, तो कभी तरक्की के चक्कर में,

दोनो ही को नशे के चक्कर में पाया है।

बचपन ने भी अपना जीवन, ऐश के लिये पाया है,

नशा क्यों न करे बचपन, आखिर,

माँ-बाप के नक्शे-कदम पर ही उनका साया है।

बचपन पड़ा है, मदहोश, बेहोश नशे में,

पढ़ने का उसे कोई होश नहीं है,

मां बाप ने दिया उसे नशे का नज़राना,

नया ज़माना है, नई रोशनी है,

अब कोई जनरेशन गैप नहीं है।

उद्धृत , लेखक की पुस्तक ’ मधु बावरे ’ से।  

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