बबूल की सेज़

बबूल की सेज़

 

मुक़द्दर ने मेरा चमन छीन कर, खि़ज़ा के नाम क्यों कर दिया,

अपनों से तो फूल भी न मांगा कभी, फिर कांटों के नाम क्यों कर दिया ।

जो मिली भी थी खुशियाँ, मेरा हक ही तो था,

फिर, बेग़ाना उनसे मुझे क्यों कर दिया ।

था बाबुल का आशियाना मेरा घर कभी,

फिर बबूल की सेज पर, बुलबुल का बसेरा क्यों कर दिया ।

मुहाफिज़, रकीब को क्यों बनाया,

कांटों के नाम, मुझे क्यों कर दिया ।

नाज़ों से पली, बाहों में थी झूली, बाबुल के अंगना में,

कभी सोचा न था ब्याही जाऊंगी, उतरेगी डोली नशे के अंगना में,

कैसे रहेगी सुहागिन, इस जीवन में,

नशे ने मेरे जीवन में,खेल सौतन का शुरू कर दिया ।

जीवन मेरा कांटों के नाम क्यों कर दिया।

डर है यह सौतन नशा, नागिन न बन जाये जीवन की,

अभी तक तो लाल जोड़ा उतरा भी नहीं,

फिर, सामान सफेद जोड़े का, क्यों रख दिया ।

कहार तो डोली के थे,

मैयत का कहार क्यों बदल दिया ।

कांटों के नाम मुझे क्यों कर दिया ।

उद्धृत: लेखक की पुस्तक ’ मधु बावरे ’ से।

 

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