बोन्साई – कलमी पौधे

बोन्साई – कलमी पौधे

 

जाने क्या सूझी बोन्साई लगाने की,

ले आया इक कलमी पौधा आम का, नसल नये जमाने की।

कलमी पौधे बड़े गुणी होते हैं, इक रंग से कई रंग देते हैं,

मुख्तलिफ़ नसल से, किस्म किस्म की नसल देते हैं,

ऐसे ये बोन्साई होते हैं।

यह पौधा आम का ही है,

खास नसल जब करनी हो पैदा,

तो आम पर ही नज़र जाती है, आम ही से खास बन पाती है।

पौधा पेड़ बनता है, पनपता तो है, मगर, कद से ऊँचा, न फैलाव होता है,

न देता छाया किसी को, न किसी को बसेरा ही देता है।

फल तो आ गया आम का, अच्छे आम का,

माली के लिये भी खतरे-शान था, मुझ माली का जीना हराम था।

आखिर कलमी आम है, नये जमाने का रंग, चढ़ गया उस पर खास है।

यही अब इंसानों में भी पाया जाता है,

दो मुख्तलिफ़ नसलों का नया संसार बनाया जाता है।

दो जुदा नसलों की कलम इक कलम की जान होगी,

तभी तो तीसरी नसल आबाद होगी।

यह कलमी रिश्ते हैं, सस्ंकारों को कलम करके ही बनते हैं।

तहज़ीब को कलम किया जाता है, फिर नई तहज़ीब के रिश्ते बनते है।

इस नसल की भी बोन्साई की ही कहानी है,

मियाँ-बीवी की अपनी ही दुनिया है,

छोटी सी सिमटी आपस में इनकी जिंदगानी है।

यह कोई छायादार नहीं, कोई रिश्तेदार नहीं, किसी से इनको प्यार नहीं,

माँ-बाप से अलग, दीन-धर्म से अलग,

नये जमाने की नकली खुशबू में मगन, कोई किसी से सरोकार नहीं।

सर पर कोई बुजुर्ग नहीं, कौन इनका रहनुमा बनें

यह तो कलमी तहज़ीब है, जैसा चाहे रंग भरें।

बीता जमाना मज़हब की खातिर सर कलम होने का,

अब धर्म रहा पीछे, रिश्ते और तहजीब कलम होते हैं,

पुराने रस्मों-रिवाजों ने मुँह मोड़ लिया,

अब कलम कर तहज़ीब की, इक नई तहज़ीब बनती है,

इक कलम पर दूजी कलम, तहज़ीब की नई तस्वीर करती है,

स्याही बन जाती है खून, फिर यह कलम,

कभी बोन्साई की शमशीर, तो कभी, तहज़ीब की तकदीर लिखती हैं।

उद्धृत: लेखक की पुस्तक ’ मधु बावरे ’ से।  

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