तकते हैं राह सहर का

तकते हैं राह सहर का

अरमानों की ख़ाक उड़ाके, बेआस, बेसहारे,

तकते हैं राह सहर का, ऐसे यह नशे के मारे।

बेनूर चेहरा, उदास आंखें,

उलझे उलझे बाल, ये उखड़ी सांसे;

दे रहा गवाही,

तबाही का मंजर है और कितने आगे।

अब तेरे पल्ले कुछ भी नहीं,

अब तू है और तेरी तबाही हैं।

माँ बाप की हो गई बूढ़ी सांसें,

कब जायेगी थम, कब होगी बंद आंखें।

बहना की झूठी आस,

कब उठेगी डोली,कब आयेगी बारात,

बीवी देख रही अपनी सिसकती माँग,

कब होगा ठीक उसका सरताज,

जो बना नशे का शैदाई है।

अब तू है, और तेरी तबाही है।

 

रिश्तेदारों के रिश्ते खत्म हो चले,

दोस्तों ने मुंह लिये हैं फेर,

डूबा है धंधा कजऱ् में सारा,

अब तो घर की नीलामी की भी नौबत आई है।

अब तू है और तेरी तबाही है।

अब तो हद हो चुकी,

कुछ भी न रखा, कुछ भी न बचा बाकी,

ये नशे की आंधी, किस मोड़ पे तुझे ले आई है।

अब तू है और तेरी तबाही है।

उद्धृत: लेखक की पुस्तक ’ मधु बावरे ’ से।

 

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