बीमार

बीमार

तन्हा, तन्हा, हो गई आज तेरी जिंदगी,

तार, तार, हो रही आज तेरी जिंदगी,

नशा बनके बीमार बन गई, आज तेरी जिंदगी।

समाज से परिवार से, तेरे सुखी सँसार से,

अलग हो गई, आज तेरी जिंदगी।

अब होता है क्यों नाराज,

जब अपने आपसे ही भाग रही तेरी जिंदगी,

शर्मो-हया से मुंह क्यों अब छिपाता है,

जब मुंह के बल ही गिर गई, आज तेरी जिंदगी।

अब यह नशा नहीं, कोढ़ का रोग बन गई है तेरी जिंदगी।

एहसास मत समझ इसे, धिक्कारा गया है तू, और तेरी जिंदगी।

झूठ किस किस से बोलता फिरेगा,

नफरत किस किस से करता फिरेगा,

वह सब तो आबाद है,

क्या नशे से आबाद है तेरी जिंदगी,

तेरी ही नशेबाजी आईना है तेरा,

देख ले उसमें, बर्बाद होती तेरी जिंदगी।

सब कुछ तू जानता है, वाकिफ है तू भी हकीकत से,

किस कदर बीमार है तेरी जिंदगी।

टूट चुका है तू अपने आपसे,

तेरा अब कुछ न रहा इस सँसार में,

सिर्फ शून्य बन कर रह गई है, आज तेरी जिंदगी।

तू वह कश्ती है, जिसकी पतवार टूट चुकी है,

और नशे के भँवर में डूब रही तेरी जिंदगी।

नशा बनके बीमार बन गई, आज तेरी जिंदगी।

उद्धृत:  लेखक की पुस्तक ’ मधु बावरे ’ से।  

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