नशीला-शून्य

नशीला-शून्य

 

मैं, मेरे ही होने का एहसास ढूँढ़ता हूँ,

नशे ने कर दिया इतना ग़ाफिल मुझको,

कि आज अपने ही अरमानों का जहान ढूँढ़ता हूँ,

नशे की राह ने इस कदर भटका दिया,

कि आज अपने ही कदमों का निशान ढूँढ़ता हूँ।

चुप हूं, खामोश हूँ, करता अपने आप ही से बातें,

उनसे उठते हुये सवालों का जवाब ढूँढ़ता हूँ।

कभी ख्यालों के बवंडर में, इस कदर फंस जाता हूं,

कि मेरे माँ-बाप के चेहरे ख्वाबों में भी धुंधले नजर आते हैं।

मेरा नाम तक याद नहीं,

आज अपन नाम का ही निशान ढूँढ़ता हूँ।

किस के कांधे पर सिर रख कर रोऊँ,

यहाँ कौन है मेरा,

आज अपने ही किये पर पछता रहा हूँ,

अपने दिल की बात किससे कहूँ,

आज अपना कोई हमराज़ ढूँढ़ता हूँ।

यह नशा मुक्ति केन्द्र है, या मुझसे मुझे ही मिलाने का कुरुक्षेत्र है,

रोगों से लैस नशे के कौरव और उन्हे खदेड़ती मेरी पाण्डव सी पांच इंद्रियां,

आज इनमें कृष्ण का अवतार ढूँढ़ता  हूं।

अब सोचता हूँ, कब लौटूंगा, मैं उस जहान में,

जहां रिश्ते हैं, माँ-बाप हैं, बहन-भाई हैं,

उन्ही के प्यार का एहसास ढूँढ़ता हूँ।

किस से कहूँ मैं दिल की बात,

जो बन के फरिश्ता, रख दे मेरे सिर पे हाथ,

मैं ऐसा गरीबनवाज़ ढूँढ़ता हूँ।

मैं फिर आना चाहता हूँ,

पाक-ओ-साफ रस्ते पर,

मैं आज सच्चा रहनुमा ढूँढ़ता हूँ।

नशेबाज हूँ पाक जहान ढूँढ़ता हूँ।

 उद्धृत: लेखक की पुस्तक ’ मधु बावरे ’ से।

 

 

 

 

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