कॉरपोरेट कल्चर

कॉरपोरेट कल्चर

घर के रूप रंग पर, नया रंग चढ़ते देखा,खरबूजे को देख, खरबूजा रंग बदलते देखा।

नौकरी के नाम पर कॉरपोरेट जगत,और उस पर,नशे और नग्नता का रंग चढ़ते देखा।

कॉरपोरेट का पौधा है, बबूल से समझौता है,

नशे का है ये कांटा, घर के हर बंदे को, ये का कांटा चुभते देखा।

घर का तू सरताज है,

कॉरपोरेट जगत का भी बॉस है तुझे सब नशा माफ है,

संग तेरे कॉरपोरेट लड़कियों की भी कतार है।

फिर क्या बात है, हर रात गुलाबी, और नशीली रात है।

कॉरपोरेट कल्चर है, हर नशा माफ है।

तेरी बीवी  की भी  क्या बात है, सुना है, वह भी किसी कॉरपोरेट दफतर में बॉस है।

फिर,तेरा भी रस्ता साफ है, माईनस माईनस प्लस होता है, गणित का सही हिसाब है।

बीवी भी तंग थी, चूल्हे-चैके से,

कम्प्यूटर साइंस में थी अव्वल, नौकरी भी मिल गई झटके से।

कॉरपोरेट जगत की कमाई है, भूल गई वह भी किसी की लुगाई है,

नाच रही वह भी नशे में झूम के,चाहे किसी मर्द का हाथ हो कमर पे, या,

कूल्हे पर उसके, या, किसी के हाथों में उसकी कलाई है।

ये तो कॉरपोरेट जगत का कल्चर है, यह सब रंगीन कमाई है।

बेटी भी तेरी अभी अभी हुई जवान है,

उसका भी कहां दिल लगता है, कॉरपोरेट जगत में उसका भी दिल अटका है।

एक कॉल सेंटर से भी, उसकी हो गई बात है,

नौकरी बहुत अच्छी है, रात की डियूटी पक्की है, और फिर दिन भर मौज मस्ती है।

बाहर के कोई बंदे नहीं, कोई काले धंधे नहीं,

हर रोज किसी न किसी के संग, रंगरलियाँ सजती है।

सब अपने दफ्तर के हैं, सब तो कॉरपोरेट जगत के हैं,

यह कॉरपोरेट कल्चर है, यहां सब चलता है।

बेटा भी तेरा तंग हो गया है, उम्र है पंद्रह साल,

मगर, नशे का उस पर भी रंग चढ़ गया हैं।

मम्मी, डैडी, बहना, फिर पैसौं का है क्या कहना,

हर इक से कुछ न कुछ, बटोर ही लेता है,

संग दोस्तों के नशा पे नशा करता है,

आखिर कॉरपोरेट जगत की कमाई है, हो रही सारे घर की तबाही है।

नशे के खुमार में, अक्सर तेरा लड़का रहता है,

ब्राउन शुगर हो या, कोकीन, उसे अब कुछ फर्क नहीं पड़ता है।

अब तो तूने माना, गलत कदम है, फूलों के संग बबूल लगाना।

उद्धृत: लेखक की पुस्तक ’ मधु बावरे ’ से।

 

 

 

 

 

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