उतारने सूरज को आंगन

उतारने सूरज को आंगन

नंगे पांव, सूखे बदन
हाथ औज़ार, कांधे जिम्मेदारी
नवल स्वप्न, सस्मित वदन
धरा – विश्वकर्मा
आदतन
आज भी लामबद्ध,
बनाने सीढ़ी
आसमां की चोखट तक,
उतारने सूरज को आंगन।
‘हैया हो… हैया हो…’
गुदगुदाएगी कान,
पसीना धोएगा मुंह,
औज़ारी खनक
उतारेगी लिहाफ़
तब
अंगड़ाई ले मुस्कुराएंगे
’प्राची – कुंवर’,
और ’बामुलाहिज़ा’
भोर-भेरी संग
उतरेंगे धरा-धाम पर
सजीले -‘भुवन – भास्कर’
हम नत, करेंगे ज़ुहार-
’तम हरो, रोशन करो ‘
’तम हरो, रोशन करो’ |