वे

वे

 

 

वे

रचते रहे

छन्द, प्रबन्ध

मुझ,

निर्बल की

पीड़ा-प्रताड़ना पर

पाते रहे

प्रसिद्धि-पुरस्कार ।

भूल मुझे

मनाते रहे जश्न ।

ताकि

मिलते रहें- विषय, प्रतीक

भावी साहित्य को ।

मैं ’जैसा था’

देता रहा दुआ-

पलते रहो, पुजते रहो

आशीष.. आशीश.. आशीष !

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