कसक

लज्जा से काँप रही धरती|
नद कूप कराह रहे कोकिल|।
नैनो के आँसू आनंद वन |
सूखे प्रियतम अंग अंग |
दवा धरा में खरे नहीं |।
नहरो नीर कही नहीं ।
नारी की लाज बचाने को |।
लश्कर मैखाने अड़ा नहीं |
शरन लिये जो छले हैंजाते।।
पणव छोड़कर पराण बचाते।
अपने ही घर अन्तर्दाह कराते॥

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