कहती हैं बंदिशे मेरी…….

केहती है बंदिशे मेरी , आगे अब तू ना बढ़ना ,
पर्वत तेरी बस कि ना है , ऊपर अब तू ना चढ़ना .
तुझमे जो प्यास थी , होती अब वो पूरी है ,
तुझमरे जो आग थी , अब वो जलती अधूरी है .
खुद को ना कभी समझ सका , ना खुद को कभी परख सका ,
था मन मे तब सुख पड़ा , जो बादल बन ना बेह सका .
कदमो के ख्वाहिश को मैंने , खुद से हर पल दूर रखा ,
लगी बंदिशों कि वो जकड़न , फिर जमीन से उठ ना सका .
नहीं मिला था कोई किनारा ,मेरे साहिलो कि कश्ती को ,
अब बढूंगा नहीं थामूंगा , लिए सहारे पतवारों को .
आज यही है मुझको केहना , नहीं कोई अब बंदिश सेहना ,
तोड़ के सारे जकड़न मेरे , अब मुझको है आघे बढ़ना .
कहती हैं बंदिशे मेरी……..

nitesh singh(kumar aditya)

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