देश प्रेम के दीपक को अब नई ज्वाल देनी होगी

मेरे प्रिय मित्रों – काफी समय से वीर रस पर लिखना चाहता था, पर लिख नहीं पा रहा था I
लेकिन लगता इस बार लिख डाला है, अब यह कोशिश किस हद तक कामयाब हुई है,
यह तो आप सभी की पसन्द-नापसन्द तथा विचार ही बताएँगे I
आध्यात्मिक धन्यवाद के साथ – गुरचरन मेहता :-
——————————————————
मेरे बलम मेरे मनमीत मैं भी तो लिख सकता हूँ I
मेघ मल्हार के सुन्दर गीत मैं भी तो लिख सकता हूँ I
चन्दा और चकोर की रीत मैं भी तो लिख सकता हूँ I
प्रेम प्यार के ये प्रतीक मैं भी तो लिख सकता हूँ II

पर क्यूँ नहीं लिख पाता मैं ये बात तुम्हे समझाता हूँ I
भीतर में गुबार भरा जो आज तुम्हे बतलाता हूँ I
श्रृंगार में जब मैं बात करूँ तो भार सा मन में आता है I
मन बरसों पीछे भागता है अंगार समाता जाता है I
दो सौ साल अंग्रेजों ने -लुटी देश की माटी है I
कैसे भूलूं बुजुर्गों को -गुलामी कैसे काटी है II

लालाजी पे लाठी प्रहार दिल के टुकड़े कर देता है I
जीना कैसा था दुश्वार मन चिथड़े से कर देता है I
झांसी की रानी याद करूँ-दिल अंदर से भर जाता है I
अशफाक खान की सोचूं तो मन सौ सौ बार मर जाता है I
पंजाब से लेकर लन्दन तक उद्धम सिंग की कहानी है I
राजगुरु-सुखदेव-भगत सिंग- वीरों की अमर जवानी है II

देश के लाल सुभाष बोस की बात भी जग से निराली है I
खून के बदले आज़ादी कहाँ बात भूलने वाली है I
दीवाली मनती रहे, खेली खून की होली थी I
ख़ुशी कदम चूमे यहाँ -सीने पर झेली गोली थी I
जलियाँवाला याद जो आये – खून खोलने लगता है I
जाने दिल खुद कैसे – वंदे मातरम् बोलने लगता है II

आज़ादी के दीवाने तो आज़ादी को अड़े रहे I
सत्ता के भूखे-नंगे कुर्सी के लिए बस खड़े रहे I
मन के काले तन के उजले गोरों की कोई कमी नहीं I
अपने सुन्दर देश में यारों चोरों की कोई कमी नहीं I
आज भी अपनों से अपनों को आघातों की कमी नहीं I
बगल में देखो आस्तीन के साँपों की कोई कमी नहीं II

देश के ऐसे गद्दारों के माथे को पढ़ना होगा I
सर काट कर जयचंदों का माला में जड़ना होगा I
प्रेम प्रीत को छोड़, कुचल कर, अब आगे बढ़ना होगा I
बाहर के दुश्मन तो हैं, अंदर भी अब लड़ना होगा I
श्री कृष्ण को चक्र सुदर्शन फिर से अब धरना होगा I
“शिशुपाक” को पहली ही गल्ती पर अब मरना होगा II

घोटाले दर घोटाले हमें यही समझाते हैं I
आज़ाद देश पर हम गुलाम, बात यही बतलाते हैं I
हम तो सैनिक कलम के हैं हम सच की भाषा बोलेंगे I
एक ही पलड़े में देखो हम सत्य असत्य तोलेंगे I
कलमकार हैं कलम से हम तो नई क्रांति ला देंगे I
जन जन के मन के अंदर हम देश प्रेम जगा देंगे II

नई उड़ाने, नई दिशायें, नए पर देने होंगे I
रुंधे-रुंधे कंठों को अब नए स्वर देने होंगे I
देश प्रेम के सुर संगम को नई ताल देनी होगी I
देश प्रेम की भावना को नई ढाल देनी होगी I
देश प्रेम को नई ओढनी नई शाल देनी होगी I
देश प्रेम के दीपक को अब नई ज्वाल देनी होगी II

देश प्रेम के दीपक को अब नई ज्वाल देनी होगी I
देश प्रेम के दीपक को अब नई ज्वाल देनी होगी II
____________________________________
सर्वाधिकार सुरक्षित –त्रुटि क्षमा हेतु प्रार्थी –गुरचरन मेहता

4 Comments

  1. Sukhmangal Singh Sukhmangal Singh 14/11/2013
  2. Sukhmangal Singh Sukhmangal Singh 14/11/2013
  3. अतुल बालाघाटी 21/12/2015
  4. Kamaljat 09/08/2016

Leave a Reply