मेरे यार गुलज़ार

 

तुम भी गज़ब हो मेरे यार “गुलज़ार”

सोचा था आज रात तेरे साथ बिताउंगा
जो बाते किसी से न बोली वो बाते बतलाऊंगा
बुरी भली जैसे भी है सारी आज सुनाऊंगा

रखा कदम तेरे कूचे में गया मैं सब भूल
जब तूने मुझे दिखाया साहिल पे वो नूर

हर बार यही मेरे साथ होता है… कहने आता हूँ मैं अपनी
हर बार तेरी सुन जाता हूँ …..जाने कैसी बात है तुझ में
तुझ में ही खो जाता हूँ…….. जगत सुनी न अपनी सुनी
ना जाने तेरी क्यों सुन जाता हूँ.. कहे “बंजारा” ये हाथ जोड़ कर
कर दो मुझ पे भी एक उपकार ..मैं भी रात में हूँ चाँद फूंकता
पर ना जाने क्यों अब वो आग नज़र नहीं आती ..एक तिल्ली मुझे भी दे दो उधार मेरे यार!

तुम भी ग़जब हो मेरे यार “गुलज़ार”

बंजारा

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