बहुत थक गई हू..

बहुत थक गई हु, अब चैन से सोना चहती हू…

 

मदमस्त इस उनमुक्त गगन मे,

पन्छी सी उड जाना चहती हू…

निश्चल लेहराती मछ्ली सी,

गहरे पानी मे डूब जाना चहती हू…

 

बहुत थक गई हु, अब इस जिन्दगी से मुक्त होना चहती हू…

 

पेडो सी निष्पक्श छाया,

सबको देना चहती हू…

फूलो सी बेशूमार खुशबू,

हर तरफ बिखेरना चहती हू…

 

बस अब बहुत थक गई हू,

अब सबकी स्मर्ति मे आकांक्षा बन सदा के लिये बस जाना चहती हू……

 

– आकांक्षा रमण  (स्मर्ति)

 

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  1. SUHANATA SHIKAN SUHANATA SHIKAN 19/11/2013

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