कुछ यादें कभी नहीं जाती

 

वो स्पेंसर और सिटी सेण्टर की शाम,

सत्यम और इनोक्स में भीड़ की लम्बी आलम,

कैंप रोड की जगमगाती और भागती रफ़्तार,

वो पानी टंकी के मैदान में क्रिकेट खेलने की मार ॥१॥

 

वो भारत यूनिवर्सिटी की लम्बी भीड़,

वो इंजिनियर होने का एक अलग सा अभिमान,

वो मैकेनिकल डिपार्टमेंट का एकलौता रास्ता,

तो वन्दलुर जू में निकलता पागलपन ॥२॥

 

घरवालो से अर्रिएर छुपाना,

रात के अँधेरे में महाबलीपुरम जाना,

तिरुपति मंदिर में “गोविंदा गोविंदा गोंविंदा” जपना,

वो जब कुछ कर के दिखने का सपना ॥३॥

 

साल बीतते गये,

नये नये लोग मिलते गये,

अब सुबह सुबह ऑफिस शाताती,

रात मालूम नहीं कब बीत जाती ॥४॥

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