बेरोजगारी से अच्छी मौत

 

छुप छुप रोता कभी ना कहता, मन के राग ज़माने को ।

हितकारी है माना मशीहा, पल में राह दिखने को ।

नित दिन जागे राह निहारे, सुमिरत अल्ला ईश्वर को ।

क्या मिलता इन्सान को आखिर, गली वक्त ज़माने के ।१।

 

दुद्कारा वह छोड चौकट, पाठ समझता जीवन के ।

दिल से बड़ी दहलीज की कीमत, राग समझता रस्मो के ।

बेरोजगारी तनहा कर देती, महफ़िल में पैसेवालों के ।

बिन दौलत जीवन क्या है, अश्लील निगाहें ज़माने के ॥२॥

 

मन से तनहा, तन से तनहा, इंसानियत ने तनहा रुला दिया ।

तन्हाई थी साथी हमारी, उसको भी मुझसे छीन लिया ।

दर दर गया, आखें सजाया, उम्मीद के दीपक  को न जलने दिया ।

भगवन की गैरत तो देखो, खुद्दारी ही मेरी छीन लिया ॥३॥

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