मुक्तक

अहर्निश याद में उनकी हम मदहोश रहते हैं |
चक्कर खा के गिरते हैं तो सब बेहोश कहते हैं ||
दिल पर जख्म उनके हैं जिस्म को जख्म हम देंगें ||
फुहांरें खून जब बरसें इश्क का जोश कहते हैं ||

डोली चाहना की थी भावना के कहांरों पर |
सजावट काम सौंपा था आसमां के सितारों पर |
स्वागत गीत में उनके ऋचाएं थी लिखी अनुपम ||
मगर वो थे बदल बैठे जालिमों के इशारों पर ||

मेरी भावना को वो अकिंचन पढ़ नहीं पाये |
स्वप्न का अश्व भेजा था मगर वो चढ़ नहीं पाये ||
साँचें जो बनाये थे वो साँचें थे मेरे साँचें |
साँचें साँच के पाकर भी भी साँचें गढ़ नहीं पाये ||

दर्द के गीत मेरे है मगर लय ताल सुर के है |
दर्द देकर वो बोले थे कि वो भी कानपुर के है ||
दर्द के गीत से भी हम विजय जय घोष कर देंगें |
हार को नौलखां कर दें हमभी ऐसे घर के हैं ||

आचार्य शिवप्रकाश अवस्थी
9582510029

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