जिंदगी के किताबों पे…..

जिंदगी   के   किताब  ….

 

जिंदगी   के   किताबों   पे  लिखी  ,

कुछ  गम  के  कुछ  ख़ुशी  के  स्याही  से ,

पन्ने थे  मेरे  ख्वाबों  के,  कलम  मेरी  निगाहों  के.

लिख  कर  मैं   पढ़  न  सका,   चुकी  शब्द  न  थे  मेरे  खयालो  के .

सुबह  को  थी  सूरज  कि  रौशनी , रात  को  चाँद  जगमगाता ,

ग्रहण  भी  गर  लग  जाता  तो , गुजरा  वक़्त  करीब  आ  जाता .

युँ  देख  मुझे  इठलाकर   मुस्कुराकर  कहती  ये  जिंदगी ,

एक  पन्ना  अब  तक  भरा   नहीं ,किताब  क्या  लिखेगा  जिंदगी  के .

ऐसी  बातें सुनकर  अक्सर , मन  बिखर  सा  जाता ,

पर  दिल  को  है  जीने  कि  चाहत , जो  बिखरना  उसे  ना  आता  .

वक़्त  हर  पल  है  ये  केहता ,आज  सुन  ले  तू  ये  मुझसे ,

किताबों  कि  पहचान   है   होती  , अंदर  भरे  उसके  पन्नो  से .

जिंदगी के किताबो पे लिखी,

कुछ गम के कुछ ख़ुशी के स्याही से…….

 

नितेश सिंह(कुमार आदित्य)

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